टेलीकॉम इंडस्ट्री में आया भूचाल, आम आदमी पर पड़ेगी मार, महंगे होंगे सभी प्लान्स

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Reliance Jio ने जब भारतीय बाजार में एंट्री ली थी तो टेलीकॉम सेक्टर में नई क्रांति देखने को मिली थी। Jio की बदौलत टेलीकॉम सेवाएं बेहद सस्ती हो गई थी और सभी कंपनियों ने सस्ती कीमत पर टैरिफ प्लान पेश किए थे। लेकिन अब एक बाद फिर इंडियन टेलीकॉम डिपार्टमेंट बड़े बदलाव को देखने वाला है। लेकिन आपको बता दें कि इस बार यह बदलाव अच्छा नहीं बुरा साबित होने वाला है। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने टेलीकॉम सेक्टर में भूचाल मचा दिया है, और इसका सीधे असर आम जनता पर पड़ना तय है। Vodafone Idea और Airtel ने कह दिया है कि 1 दिसंबर से वह अपने प्लान्स महंगे करने वाले हैं। सिर्फ इतना ही नहीं टेलीकॉम यूजर्स को कई सेवाओं पर मोटी रकम चुकानी पड़ सकती है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर क्यों प्लान्स को सस्ते करने के बाद अब ​ये कंपनियां इतने सख्त फैसले ले रही है।

सबसे पहले तो अपको बता दें कि इस वक्त इंडियन टेलीकॉम इंडस्ट्री इतिहास के सबसे बड़े घाटे का सामना कर रही है। इस नुकसान की गाज देश की 15 टेलीकॉम कंपनियों के पर पड़ी है और अब आम यूजर्स को भी टेलीकॉम कंपनियों के घाटे की मार सहनी होगा। Vodafone Idea और Airtel को इस बदलाव से बड़ा घाटा हुआ है। बताया जा रहा है कि Vodafone Idea को जहां 50,921 करोड़ का नुकसान हुआ है वहीं Airtel को भी 23,044 करोड़ की हानि का दंश झेलना पड़ा है। टेलीकॉम कंपनियों को हिलाकर रख देने वाला नाम है AGR

क्या होता है AGR

एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) यानि समायोजित सकल राजस्व। एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू दूरसंचार विभाग द्वारा वसूला जाने वाला कर है, जो उपयोग और लाईसेंस संबंधित सेवाओं के बदले में टेलीकॉम कंपनियों से लिया जाता है। यह सारा विवाद और टेलीकॉम कंपनियों का चैन छिछने वाला मुद्दा AGR का ही है। 2003 से चले आ रहे विवाद को इस साल खत्म कर दिया गया है। 24 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने एजीआर की परिभाषा को बदल दिया है। कोर्ट ने इस विवाद को खत्म करते हुए डीओटी के पक्ष में फैसला सुनाया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि सभी टेलीकॉम कंपनियों को 3 महीने के अंदर अपना पूरा बकाया चुकाना होगा।

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क्या है विवाद

कौन कौन सी सेवाएं एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू के दायरे में आनी चाहिए इस बात का विवाद 15 साल पुराना है जो साल 2003 से चला आ रहा है। टेलीकॉम कंपनियों की मांग थी केवल लाईसेंस प्राप्त सेवाओं पर ​मिलने वाले राजस्व को ही AGR के तहत रखना चाहिए और कंपनियां सिर्फ उसी से प्राप्त हिस्से को सरकार को देगी। लेकिन दूरसंचार विभाग का कहना था कि AGR के तहत टेलीकॉम कंपनियां से जुड़ी सभी सर्विस आनी चाहिए और उन पर कर वसूला जाना चाहिए।

अब थी यह स्थिति

AGR के तहत पहले सिर्फ फोन सेवाओं से जुड़ी आमदनी ही शामिल की गई थी। यानि सिम बेचने, कॉलिंग, इं​टरनेट, मैसेज, रिंगटोन, अलर्ट व रोमिंग जैसी सर्विसेज से टेलीकॉम कपंनियों की जो कमाई होती थी, उसी कमाई के हिसाब से कंपनियां सरकार को कर देती थी। पुरानी परिभाषा के तहत 5 प्रतिशत स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क और 8 प्रतिशत लाईसेंसिंग शुल्क ही एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू यानि समायोजित सकल राजस्व में दिया जाता था।

यह हुआ नया बदलाव

DOT यानि दूरसचांर विभाग की गुहार के बाद सुप्रीम कोर्ट ने तय किया है कि एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) के तहत फोन सेवाओं के साथ-साथ कंपनियों को मिलने वाले ब्याज पर भी टैक्स लिया जाएगा। सिर्फ इतना ही नहीं नई परिभाषा के तहत टेलीकॉम कंपनियां अब अपनी प्रॉपर्टी को बेचने पर मिले पैसे तथा किसी प्रॉपर्टी को किराये पर देने से मिलने वाले पैसे पर भी सरकार को टैक्स देगी। ये सब अब से AGR के तहत शामिल रहेंगे।

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1,34,000 करोड़ का बकाया

दूरसचांर विभाग ने जुलाई महीने में सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट जमा की थी, जिसमें 15 टेलीकॉम कंपनियों के नाम शामिल थे। इस लिस्ट में भारत की मौजूदा टेलीकॉम कंपनियों के साथ ही पिछले सालों के दौरान इंडियन मार्केट में काम कर चुकी टेलीकॉम कपंनियों के नाम भी शामिल थे। इस रिपोर्ट में DOT ने पूरा लेखाजोखा बताया था कि किस कपंनी के उपर कितना राजस्व बकाया है। वहीं अब अक्टूबर महीने में सुप्रीम कोर्ट द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद इन टेलीकॉम कं​पनियों को यह राशि चुकानी होगी।

लिस्ट में मौजूद 15 टेलीकॉम कंपनियों को कुल 1,34,000 करोड़ रुपये का बकाया चुकाना होगा। इन राशि में 93,000 करोड़ रुपये जहां सिर्फ लाईसेंस टैक्स, फाईन और इंटरस्ट अमाउंट हैं वहीं 41 हजार करोड़ रुपये इन कंपनियों को स्पेक्ट्रम यूज़ेज के बदले में चुकाने होंगे। इस रिपोर्ट के मुताबिक Vodafone Idea व Airtel को सरकार को 80,000 करोड़ रुपये चुकाने हैं। वहीं अनिल अंबानी की R Com को 20,000 करोड़ रुपये और और Tata टेलीसर्विस को राजस्व के तौर पर 13,000 करोड़ रुपये चुकाने होंगे।

टेलीकॉम कंपनियों में खौफ

Vodafone कंपनी के सीईओ Nick read ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह तक कह दिया था कि कंपनी अब भारत में और अधिक निवेश नहीं करेगी। लेकिन बाद में आलोचना होने के बाद निक ने सफाई दी और प्रधानमंत्री मोदी से माफी मांगते हुए कहा कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया था। वहीं Vodafone की साझेदार कंपनी Idea के बिड़ला ग्रुप ने कहा है कि उनके पास शुल्क चुकाने के पैसे नहीं हैं, अब वह और अधिक निवेश नहीं कर सकते हैं।

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