क्या आप अब भी करते हैं Nokia से प्यार? जानें नोकिया के बनने, मिटने और फिर बनने की कहानी

Image Courtesy: thehindu

कभी भारत में Nokia का नाम वैसे ही था जैसे कारों में मारुति और टूथपेस्थ में कोलगेट। फोन का मतलब ही लोग नोकिया को जानते थे। परंतु समय ने ऐसी करवट ली कि विश्व में राज करने वाली कंपनी बिकने को मजबूर हो गई। हालांकि फिर कई बार इसे बनाने की कोशिश की गई लेकिन राहें इतनी आसान नहीं थी। आज एक बार फिर से Nokia सुर्खियों में है। हाल में कंपनी ने घोषणा की है कि वह अब भारत में अपने फोन बनाएगा और विश्व भर के बाजारों में सेल करेगा। इससे न सिर्फ मेक इन इंडिया को बल मिलेगा बल्कि भारत से निर्यात उन देशों तक जाएगा जहां नोकिया फोन के सेल हैं। आज Nokia का शोर फिर से हो ही रहा है तो आपके मन में ये सवाल जरूर आता होगा कि यह ब्रांड कब बना, कैसे इसकी शुरुआत हुई और कैसे फिर ये बिखर गया? तो चलिए हम Nokia के बनने और बिखरने और फिर बनने की कहानी जानते हैं।

150 साल से भी पुराना है नोकिया का इतिहास
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माइनिंग इंजीनियर फ्रेडरिक इडेस्टैम (Fredrik Idestam) ने वर्ष 1865 में अपनी पहली पल्प मील यानी पेपर फैक्ट्री फिनलैंड के शहर टैंपेयर (Tampere) के पास स्थापित की। हालांकि उस वक्त यह जगह रूस के अधीन थी। कुछ सालों बाद ही 1868 में उन्होंने यहां से 15 किलोमीटर दूर नोकिया शहर में अपनी दूसरी पल्प मील की शुरुआत की। यह शहर नोकियानवेरता नदी पर स्थित था और हाइड्रोपावर की अच्छी सुविधा थी। हालांकि उस वक्त तक नोकिया कंपनी का नाम नहीं था। परंतु फ्रेडरिक इडेस्टैम ने 1871 में अपने दोस्त लियो मैकलीन (Leo Mechelin) के साथ मिलकर एक शेयर्ड कंपनी बनाई जिसे नोकिया एबी (Nokia Ab ) का नाम दिया गया है। यहीं से Nokia की नींव रखी गई। इडेस्टैम और मैकलीन कंपनी के पहले को-फाउंडर बने। उस वक्त तक Nokia पेपर मिल सहित कुछ दूसरे व्यवसाय से भी जुड़ी थी। इसे भी पढ़ें: बेस्ट नॉन चाइनीज फोन जो बन सकते हैं आपकी पसंद, देखें पूरी लिस्ट

Leo Mechelin, co-founder of Nokia

हालांकि दोनों फाउंडर में मतभेद था। मैकलीन केबल और इलेक्ट्रॉनिक्स बिज़नेस में जाना चाहते थे जबकि इडेस्टैम इसके खिलाफ थे। 1896 में इडेस्टैम के रिटायर होने के बाद मैकलीन ने इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में कदम रखा और 1902 में उन्होंने इलेक्ट्रीसिटी जेनरेशन में हाथ आजमाया। 1914 तक मैकलीन इसके चेयरमैन रहे। हांलाकि पहले विश्व युद्ध के बाद नोकिया कंपनी दिवालिया घोषित हो गई और इसका अधिग्रहण फिनिश रबर वर्क्स ने कर लिया। इसके बाद कंपनी तेजी से विकास करने लगी और 1932 में फिनिश केबल वर्क्स ने सोउमेन कैपेलाइटहेडस ओवाई (Suomen Kaapelitehdas Oy) (Finnish Cable Works) का अधिग्रहण कर लिया। यह कंपनी टेलीफ़ोन, टेलीग्राफ और इलेक्ट्रिकल केबल के क्षेत्र में काम करती थी और यहीं से नोकिया का टेलीकॉम सफर शुरू होता है। उस वक्त नोकिया ने आम जनता के साथ मिलिट्री के लिए भी रेस्पीरेटर्स बनाए। इसे भी पढ़ें: Android 11 के बेस्ट 11 फीचर्स, जो बदल देंगे स्मार्टफोन यूज करने का अंदाज

अगले पांच से छह दशकों तक कंपनी टायर, जूतों, केबल्स, टेलीफ़ोन इक्यूपमेंट के कारोबार में लगी रही लेकिन 1960 के दशक में कंपनी ने मिलिट्री और आम जनता के लिए मोबाइल रेडियो टेलीफ़ोन के निर्माण में कदम रखा और यहां से डिवाइस की शुरुआत होती है।

नोकिया कॉर्पोरेशन
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काफी सालों तक नोकिया, कैपेलाइटहेड्स और फिनिश रबर वर्क्स अलग-अलग काम कर रहे थे और कंपनी सोवियत यूनियन में अपनी अच्छी लोकप्रियता हासिल कर चुकी थी। 1967 में इन तीनों कंपनियों को मर्ज करके एक नई कंपनी ”नोकिया कॉर्पोरेशन” (Nokia corporation) बनाया गया। इसके साथ ही कंपनी ने अब नेटवर्क और रेडियो इंडस्ट्रीज़ में भी कदम रखा और फिनिश सेना के लिए भी इक्यूमेंट बनाने लगी। कंपनी ने टेलीफ़ोन एक्सचेंज स्विच और रोबोटिक एक्सचेंज भी तैयार किए। हालांकि नोकिया में सबसे ज्यादा बदलाव आया 1977 में इसके नए सीईओ कैरी काईरैमो (Kari Kairamo) के आने के बाद। इनके रहते कंपनी ने कई दूसरी कंपनियों का अधिग्रहण कर लिया। 1984 में टेलीवीज़न कंपनी सलोरा, 1985 में कंप्यूटर मेकर लक्सर, 1987 में फ्रेंच टेलीविज़न मेकर ओसियेलिक और 1988 में एरिक्सन कंप्यूटर डिविजन का अधिग्रहण कर लिया गया। हालांकि काईरैमो का अंत बहुत ही दुखद हुआ और 1988 में उन्होंने आत्महत्या कर ली। वहीं इस दौरान फिनलैंड में मंदी आ गई और फिर नेकिया ने अपने पेपर और जूते सहित दूसरे सभी बिज़नेस को बेच दिया और मुख्य रूप से मोबाइल बिज़नेस पर काम करने लगी। इसे भी पढ़ें: ब्रांड Samsung की अनकही कहानी: जानें कैसे बना ट्रेडिंग कंपनी से विश्व का नंबर एक मोबाइल निर्माता!

नोकिया मोबाइल की शुरुआत

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Mobira Talkman 1984

Nokia ने हालांकि 1984 में सलोरा का अधिग्रहण कर लिया था लेकिन उसे पहले 1960 के दशक से ही दोनों कपंनी साथ में काम कर रहे थे। नोकिया ने सलोरा ओवाई (Salora OY) के साथ मिलकर वीएचएफ रेडियो बनया था। इसी तरह 1966 में नोकिया और सलोरा ने मिलकर एपीआरएस ARPs (Autoradiopuhelin or radio car phones) बनाया और 1978 में नोकिया ने फिनलैंड में मोबाइल नेटवर्क की शुरुआत की और वह देश की पहली कंपनी बनी। खास बात यह थी कि इसने 100 फीसदी कवरेज के साथ शुरुआत की जो उस वक्त बहुत बड़ी बात कही जा सकती थी।

इस दौरान Nokia ने मिलिट्री के लिए इनक्रिप्टेड टेस्क्ट बेस्ट कम्यूनिकेशन डिवाइस भी बनाया जिसे Sanomalaitejärjestelmä नाम दिया गया था। अब कंपनी डिवाइस क्षेत्र में आ चुकी थी और डिवाइस क्षेत्र में हाथ आजमाने को तैयार थी। 1979 में सलोरा के साथ मिलकर नोकिया ने मोबिरा ओवाई कंपनी की शुरुआत की और इसके तहत नॉर्डिक मोबाइल टेलीफोन के लिए पहला हैंडसेट 1जी को पेश किया। यह कंपनी का पहला फुल फंक्शन मोबाइल फोन था। 1981 में यह मोबाइल सेल के लिए उपलब्ध हो गया। इसके बाद 1982 में पहला कार फोन मोबिरा सेनाटोर पेश किया गया। 1984 में नोकिया द्वारा सलोरा का अधिग्रहण करने के बाद यह कंपनी नोकिया मोबिरा ओवाई ‘Nokia-Mobira Oy’ नाम से स्थापित हुई। इस साल कंपनी ने मोबिरा टॉकमैन 800 को पेश किया। वहीं 1987 में कंपनी ने बेहद ही शानदार फोन मोबिरा सिटिमैन 900 को पेश किया और यह अपने समय का सुपरहिट मोबाइल साबित हुआ। कारफोन सेनाटोर का वजन जहां 9 किलोग्राम के बराबर था, वहीं टॉकमैन 5 किलोग्राम के आस-पास था। परंतु सिटिमैन सिर्फ 500 ग्राम का था और इसे लोगों ने हाथों-हाथ लिया। यह मोबाइल थोड़ा महंगा तो था लेकिन स्टेटस सिंबल बन गया। 1989 में Nokia-Mobira Oy का नाम बदलकर नोकिया मोबाइल फोंस कर दिया गया (Nokia Mobile Phones)।

नोकिया ने पहना नंबर 1 का ताज

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Nokia-Communicator-9000

1987 में फिनिश सरकार का उपक्रम टेलीफेनो में नोकिया ने शेयर्स लिए और 1992 तक नोकिया ने अपना सारा गैर मोबाइल कारोबार बेच कर नोकिया कम्यूनिकेशन की शुरुआत की। 1992 में कंपनी ने नोकिया नाम से पहला डिजिटल जीएसएम फोन Nokia 1011 लॉन्च किया। इस फोन को 10 नवंबर को लॉन्च किया गया था इसलिए मॉडल का नाम 1011 रखा गया।

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1992 में ही एरियल के साथ आया Nokia 101, इसके बाद 1994 में Nokia 2110 आया जिसमें रिंगटोन दिया गया था। 1996 में आया Nokia 8110, 1997 में नए फीचर्स के साथ आया Nokia 6110 और बिना बाहरी एंटीना के Nokia 8810 खरीदारों के बीच 1998 में आया। यह दौर फीचर फोन का था लेकिन इसी साल नोकिया ने स्मार्टफोन को लेकर एक बड़ी कोशिश की और कंपनी ने 9000 Communicator को उतारा। सिंबियन ओएस पर चलने वाला यह फोन मिनी लैपटॉप की तरह था और लोगों ने काफी पसंद भी किया। अब तक कंपनी भारत में भी दस्तक दे चुकी थी। इन सभी फोंस ने इतिहास बनाने का काम किया है और इन्हीं के दम पर नोकिया उस दौर के दिग्गज कंपनी Motorola और Ericsson को पीछे छोड़ नंबर 1 मोबाइल निर्माता बनने में सफल रही।

नोकिया बना बादशाह
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हालांकि नोकिया की सफलता की कहानी यहीं नहीं रुकी। कंपनी के सारे फोन सफलता का नया इतिहास लिख रहे थे। 2002 में नोकिया का पहला 3जी फोन Nokia 6650 आया, 2002 में ही नोकिया ने अपना पहला रंगीन मोबाइल 7650 को लॉन्च किया। नोकिया ने अपना पहला वीडियो रिकॉर्ड में सक्षम मॉडल Nokia 3650 भी 2002 में ही पेश किया। 2003 में नोकिया ने वीडियो गेम वाला N-Gage निकाला जिसने मोबाइल यूजर्स को नए गेमिंग फीचर्स से रू-ब-रू कराया।

हालांकि 2003 में एक ऐसा भी फोन आया जो अब तक कहीं न कहीं देखा जाता है और सेल के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर डाले। जी हां! मैं Nokia 1100 की बात कर रहा हूं। विश्व भर में 250 मिलियन यूनिट सेल के साथ नोकिया 1100 ने रिकॉर्ड बना दिया था।

2005 में आई नोकिया की N Series, कंपनी के N 71, N 81 के साथ N 95 ने कमाल कर दिया। इसके अलावा ExpressMusic और ‘E’ सीरीज के फोन भी लोगों के ज़ुबान पर छा गए। आलम यह था कि 2005 तक 60 फीसदी से ज्यादा मोबाइल बाजार पर सिर्फ नोकिया फोन का राज था। वहीं स्मार्ट ओएस में ब्लैकबेरी जैसे दिग्गज के होते हुए भी नोकिया सिंबियन ओएस का कब्जा 80 फीसदी बाजार पर था।

नोकिया नजर से होने लगा दूर
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हालांकि वर्ष 2007 के बाद नोकिया के रुतबे में कमी आने लगी। स्मार्टफोन का बाजार बढ़ रहा था और इसके लिए Nokia सिंबिंयन ओएस यूज करता था। 2007 में एप्पल आईफोन 3जी लॉन्च किया गया और इसी साल एंड्रॉयड भी आ गया। सिंबियन ओएस 1998 में तो काफी अडवांस था लेकिन 10 साल बाद भी इसमें बहुत सुधार नहीं देखा गया और इसका उपयोग सीमित हो गया। ऐसे में सबसे पहले स्मार्टफोन बाजार में कंपनी ने अपनी बादशाहत खोनी शुरू कर दी। टेक्नोलॉजी अडॉप्शन में भी यह काफी पीछे रही। जहां दूसरी कंपनियां 2007-08 में ही डुअल सिम पर फोकस कर रही थी। वहीं Nokia ने अपना पहला डुअल सिम फोन 2010 में पेश किया। इससे उसके फीचर फोन मार्केट पर भी बुरा प्रभाव पड़ा।

एन्ड्रॉयड से लगातार मिल रही प्रतिस्पर्धा के बीच कंपनी ने सिंबियन छोड़ने का निर्णय तो ले लिया लेकिन एंड्रॉयड को नहीं अपनाया। 2011 में कंपनी ने विंडोज़ फोन लॉन्च किया परंतु यह कोशिश असफल रही और नोकिया के मुकाबले सैमसंग का गैलेक्सी एन्ड्रॉयड फोन सफलता की नई इबारत लिखने लगा। 2012 में नोकिया के स्मार्टफोन के शिपमेंट में 2010 के मुकाबले 65 फीसदी की गिरावट देखी गई।

एप्पल के आइफोन ने 2011 में स्मार्टफोन बाजार में नोकिया की बादशाहत तोड़ी। वहीं नोकिया की बादशाहत को दूसरा धक्का उस वक्त लगा जब दक्षिणी कोरियाई कंपनी सैमसंग ने 2012 में उसे पूरे मोबाइल बिज़नेस में ही पीछे छोड़ दिया। इसके बाद नोकिया ने कोशिशें तो की लेकिन कभी भी सही से उठ नहीं पाया।

और बिक गई नोकिया
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2011 में नोकिया ने लुमिया 800 मॉडल को पेश किया। यह विंडोज ओएस पर आधारित फोन था। इसके कैमरे और फंक्सनालिटी की चर्चा काफी हुई लेकिन यह नोकिया को परेशानी से उबार नहीं सका। 2011 में फीचर फोन में आशा मॉडल से कंपनी ने उम्मीद लगाई लेकिन निराशा ही मिली। मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस में नोकिया ने अपना 808 मॉडल को उतारा जो अपने समय का सबसे ताकतवर कैमरा फोन था। इसके बाद नोकिया लुमिया 960 और लुमिया 1020 जैसे शानदार फोन आए लेकिन विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम को लोगों ने नकार दिया। अंतत: 03 सितंबर, 2013 को माइक्रोसॉफ्ट ने नोकिया के अधिग्रहण की घोषणा कर दी और कंपनी का दुखद अंत हुआ।

माइक्रोसॉफ्ट – नोकिया डील
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माइक्रोसॉफ्ट ने 7.17 अरब डॉलर में नोकिया के मोबाइल कारोबार का अधिग्रहण किया था। इस अधिग्रहण के बाद नोकिया के पास केवल नेटवर्क इक्विपमेंट कारोबार रह गया था जबकि माइक्रोसॉफ्ट के पास मोबाइल बिजनेस। सौदे के तहत नोकिया के डिवाइस एंड सर्विसेज के सभी 32,000 कर्मचारी माइक्रोसॉफ्ट के अंतर्गत आ गए थे। हालांकि यह अधिग्रहण 25 अप्रैल 2014 को पूरा हो पाया। माइक्रोसॉफ्ट ने नोकिया एक्स, आशा और लुमिया ब्रांड के नाम का अधिग्रहण किया था जो सिर्फ दिसंबर 2015 तक ही माइक्रोसॉफ्ट के पास थी। इसके बाद फिर से इसका अधिकार नोकिया के पास जाना था। इसके अलावा फीचर फोन का लाइसेंस 10 सालों के लिए माइक्रोसॉफ्ट के पास था। अधिग्रहण के नियमानुसार माइक्रोसॉफ्ट ने नोकिया ट्यून के उपर कंट्रोल नहीं लिया था और दिसंबर 2015 के बाद नोकिया अपने नाम से फोन भी बना सकती थी। 2014 से एक साल के लिए नोकिया के वेबसाइट और सोशल मीडिया पर माइक्रोसॉफ्ट का अधिकार था। हालांकि अधिग्रहण के बाद माइक्रोसॉफ्ट ने कुछ लुमिया और आशा फोन तो पेश किए लेकिन भारी नुकसान की वजह से कंपनी ने जल्द ही फोन का निर्माण बंद कर दिया।

नया हुआ नोकिया
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जैसा कि मालूम है 2016 के बाद से फिर से नोकिया फोन आने का रास्ता साफ हो गया। माइक्रोसॉफ्ट ने 2016 में फीचर फोन निर्माण का अधिकार ताइवानी कंपनी फॉक्सकॉन (FOXCON) को दे दिया। वहीं दिसंबर 2015 के बाद माइक्रोसॉफ्ट से NOKIA ब्रांड का नाम फिर से नोकिया के पास चला गया था। कंपनी ने नोकिया ब्रांड का नाम दस सालों के लिए फ़िनलैंड की ही कंपनी ‘एचएमडी ग्लोबल ओवाई’ (HMD Global OY) को दे दिया। अब नोकिया फोन का निर्माण फॉक्सकॉन और एचएमडी ग्लोबल द्वारा मिलकर किया जा रहा है। इसके तहत सबसे पहले 8 जनवरी 2017 कंपनी ने Nokia 6 मॉडल को पेश किया था। वहीं कंपनी अब तक Nokia 5 सीरीज, Nokia 3 सीरीज, Nokia 3310 और बनाना फोन जैस आईकॉनिक मॉडल को पेश कर चुकी है।

क्यों फिर है नोकिया की चर्चा
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भारत में वैसे तो नए Nokia फोन 2017 से ही उपलब्ध हो गए हैं लेकिन अभी फिर से काफी चर्चा हो रही है। उसका कारण है एचएमडी ग्लोबल के वाइस प्रेजीडेंट सनमित सिंह कोचर ने एक वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में कहा है कि ”भारत दुनिया का सबसे बड़ा मोबाइल बाजार है और इंडियन मार्केट Nokia ब्रांड के लिए भी उतनी ही जरूरी है।” उन्होंने आगे कहा कि ”Nokia इंडिया में अपने फोंस की मैन्युफैक्चरिंग का विस्तार करने की तैयारी में है। कंपनी की योजना है कि आने वाले समय में Nokia ब्रांड के फीचर फोन व स्मार्टफोन भारत में ही बनाए जाएं और यहीं से उन स्मार्टफोंस का निर्यात दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में किए जाएं।” इसके बाद से ही नोकिया फोन को लेकर भारतीय यूजर्स के बीच काफी चर्चा है।

नोकियाा शुरू से रहा है मेड इन इंडिया का फैन
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आपको शायद मालूम न हो कि 1995 में भारत में मोबाइल की पहली टेस्टिंग हुई थी और यह टेस्टिंग Nokia नेटवर्क पर ही की गई थी। 1995 में ही Nokia ने भारतीय बाजार में प्रवेश किया था और लगभग डेढ़ दशक तक भारतीय मोबाइल हैंडसेट बाजार में अपना दबदबा बनाए रखा। Nokia भारत में निर्माण इकाई शुरू करने वाली पहली मोबाइल कंपनी थी। साथ ही कंपनी ने भारतीय उपभोक्ताओं की ज़रूरतों को समझते हुए बेहद सस्ते, टॉर्च वाले और लाइफ टूल वाले फोन तैयार किए। नोकिया ने वर्ष 2006 में चेन्नई के पास श्रीपेरुबंदूर में अपनी निर्माण इकाई स्थापित की थी और उस वक्त कंपनी ने लगभग 25 करोड़ डॉलर का निवेश किया था। इस इकाई में बनने वाले 50 प्रतिशत से अधिक फोन 59 देशों को निर्यात किए जाते थे।

कंपनी ने 3210 मॉडल भारतीय बाजार में उतारा था जिसका मेन्यू हिंदी में था। इसी तरह कंपनी ने 2003 में नोकिया 1100 उतारा, जो विशेष तौर पर भारतीय उपभोक्ताओं के लिए बनाया गया पहला फोन था। इस फोन में टॉर्च थी, जिसका जादू भारतीय उपभोक्ताओं के सिर चढ़ कर बोला था। नोकिया ने विशेष तौर पर किसानों को मौसम और बाजार की जानकारी देने के लिए लाइफ टूल विकसित किया। यह टूल 1000 रुपये कीमत वाले फोन में भी उपलब्ध था और कोई अनपढ़ आदमी भी इसका आसानी से इस्तेमाल कर सकता था। नोकिया का यह प्रयोग काफी सफल रहा। नोकिया के लिए भारतीय बाजार की अहमियत को इस बात से समझा जा सकता था कि कंपनी की कुल वैश्विक बिक्री का 12 प्रतिशत हिस्सा भारत से आता था।

परंतु नोकिया के अंत के साथ से सारी आशाएं भी धरी की धरी रह गई। अब एक बार फिर से फोन की चर्चा है। ऐसे में नए नोकिया को लेकर आशाएं अब फिर से जाग उठी हैं और लगता है आने वाले दिनों में कंपनी बड़े तौर पर भारत में अपने आप को स्थापित करने वाली है और फिर से हम नोकिया की वही चमक देख पाएंगे।

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